सोमवार, 30 मई 2016

सूर्यास्त

'अखराई' पर इस बार अपने पहले कविता संग्रह 'मिट्टी के फल' से यह कविता 'सूर्यास्त' प्रस्तुत कर रहा 
                   ~ प्रेम रंजन अनिमेष 


सूर्यास्त                                 
 


चढ़ा हुआ है नट
ऊँचे खम्भे पर
और लगा रहा है आग
अपने कपड़ों में

देख रहा लोगों का हुजूम
अपनी जगह से


इंतज़ार में 
कि वह अब कूदेगा

आसपास फैलती हुई उसके
साफ़ दिख रही हैं लपटें

कई कलाबाज़ियाँ खाते सहसा
नीचे जलकुंड में
लगाता वह
मौत की छलाँग

डूबती एक आवाज़
उछलती बूँदें
लगता जैसे बिखर गये उसके चिथड़े
फैल गया उसका रक्त पानी में

लेकिन अगले दिन
वह फिर वहीं होता है
शिखर पर ! 

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

नौ महीने


नौ महीने

                       ~  प्रेम रंजन अनिमेष
माँ आज तुम्हें गुजरे
पूरे नौ महीने हो गये


नौ महीनों में
नया जीवन रच जाता
नया जन्म मिल जाता
तुम्हें भी मिला होगा
पर कहाँ किस तरह नहीं जानता


लेकिन मुझे मिल गया
जन्म नया
इन नौ महीनों में
तुम्हारी स्मृतियों ने
फिर से
रच डाला मुझे
नये सिरे से


अब देखो कैसे
नये जाये सा मैं
किलकता बिलखता
तुम्हारे ममत्व पय के लिए
होंठ खोले
इस दुनिया में...


सोमवार, 21 मार्च 2016

रंग

होली की शुभकामनाओं के साथ साझा कर रहा हूँ अपनी एक कविता रंग’  
                                        ~   प्रेम रंजन अनिमेष

रंग
 



रंग वह
जो सदा रहे संग
रंग वह
जिसमें कभी पड़े न भंग

रंग तो
निर्मल मन की उमंग
रंग तो
पुलकित तन की तरंग

रंग तो वह
जो जीवन का अंग
रंग तो वह
जो प्रकृति का प्रसंग

रंग तो
प्रेम सा अनंग
रंग तो
पानी सा निरंग

इस दुनिया में
जहाँ हर ओर
सत्ता प्रभुता की जंग
रंग किसी शिशु सा
नंग निहंग...!



सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

यह वसंत



वसंतपंचमी आयी । और यह कविता दे गयी ! उसका गुलाल सिर आँखों पर...





                                        ~ प्रेम रंजन अनिमेष


यह वसंत


                                   


फिर आयी वसंतपंचमी


माँ मैं तुम्हारा लाल
देखो रख रहा गुलाल
तुम्हारे पैरों पर


आशीष में
उसी गुलाल का
लगाया करती तुम टीका
मेरे माथे पर


माँ
सिर झुकाये खड़ा
मैं प्रतीक्षा कर रहा...



शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

कविता संग्रह 'अँधेरे में अंताक्षरी' से कविता 'हामिद का चिमटा'


  नये वर्ष की शुरुआत में एक शुभ समाचार यह कि मेरा नया कविता संग्रह ' अँधेरे में अंताक्षरी ' प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली से छप कर आ गया है । हाल ही में संपन्न विश्व पुस्तक मेले में इसका लोकार्पण हुआ ।    
  इसी संग्रह से इस बार यह कविता ' हामिद का चिमटा ' माँ को स्मरण करते हुए और उसे ही समर्पित । आज माँ को गुजरे छह महीने हो गये । वह होती तो कितनी प्रसन्न होती यह किताब देख कर और कितने आशीर्वचन कहती ! आशीष तो खैर उसका अब भी साथ है और हमेशा रहेगा...

                      ~  प्रेम रंजन अनिमेष 


हामिद का चिमटा
                                   
संगत का
साथी हो सकता है यह
औखत पर औजार

फकीर का मँजीरा
सिपाही का तमंचा

सबसे सलोना
यह खिलौना
जो साबुत रहेगा
अंधड़ पानी तूफान में
सहता सारे थपेड़े

कविता मेरे लिए
तीन पैसे का चिमटा है
जिसे बचपन के मेले में
मोल लिया था मैंने

कि जलें नहीं रोटियाँ सेंकने वाले हाथ
कि दूसरों को दे सकूँ अपने चूल्हे की आग !



मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

संकल्प


नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ अपनी यह कविता प्रस्‍तुत कर रहा हूँ

                              प्रेम रंजन अनिमेष

संकल्प



                           
तुम जिंदगी हो मेरी
तुम्हारे साथ अभी
बहुत कुछ करना है


जोड़ने  हैं सेतु  नये
गाँठनी   है    नाव
पथ्य पंथ का पकाना
फेंट    धूप   छाँव

हाथों  में  हाथ  होंठ  होंठों पे  धरना है


चालतीं नदियाँ कहीं 
पुकारते  पहाड़  ये 
हाँकता भीतर  भरा 
गुबार ये  उजाड़ ये

भूलना किसी को क्‍यों सभी में बिसरना है


कितना कुछ बाकी है
कितना कुछ  छूटा है
बूँद  बूँद  रीत  रहा
तन का घट  फूटा है

जितनी  हैं  बवाइयाँ  नेह  वहाँ भरना है


पोंछनी है आँख हर इक
और   सहेजनी   हँसी
सत्तू  में  सान  नमक
जैसी यह  तनिक खुशी

काँटों से  चोटों से  और भी  निखरना है



अपनों से  मिलना है
सपनों को लिखना है
दुनिया को लखना है
दुनिया को दिखना है

रात के  समंदर में  डूब  कर  उभरना है


कहा नहीं  किया नहीं
जो मन में गुन आया
साज  छूट  टूट  गये
साथ था  जिन्हें लाया

एक इसी जीवन में  जीकर सब  मरना है...







रविवार, 29 नवंबर 2015

लौटते हुए

पिछले दिन काम से लौटते
रास्‍ते में
मिली यह कविता
आज आपके सामने
रख रहा...

                          प्रेम रंजन अनिमेष

लौटते हुए


एक सीधी सी बात है
जो भटकाती मुझे

शाम काम से घर
उछाह में भर कर
लौटने की एक वजह
कम हो गयी है

रास्ता तकती
दरवाजे पर
अब माँ नहीं

है तो वह कहीं
वह है हमारे साथ ही


सिर पर उसी का तो हाथ है...!