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बुधवार, 30 जुलाई 2025

कविता संग्रह ‘ माँ के साथ ‘ से कुछ कवितायें


अखराई के पटल पर इस बार आपके समक्ष रख रहा पिछले वर्ष प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली से प्रकाशित अपने बहुचर्चित तथा बहुप्रशंसित कविता संग्रह माँ के साथ से कुछ कवितायें... !


पढ़ कर बताइयेगा  ! प्रतीक्षा रहेगी । 

सधन्यवाद

                           प्रेम रंजन अनिमेष 

 



बुधवार, 29 जुलाई 2020

मदर इंडिया 2020




सौ से अधिक दिन हो गये हैं महामारी के मार से अचकचा यें  लगभग बंद बंद देश और विश्व में घरवास के । मगर जबकि बाहर के दर मुक़फ्फल से थे इनसान के लिए और पैरों में अदृश्य बेड़ियाँ पड़ी, मन किसी मासूम सा  दुनिया भर में भरमता रहा और उँगलियाँ पकड़े कलम चलती रही ! देश और दुनिया में जो हालात हैं उनसे जैसे अपने आप बनती बुनती गयीं कवितायें  कई । इतने दिनों में इन कविताओं ने प्रायः एक पुस्तकाकार रूप ले लिया है जिसे नाम दिया है ~ 'संक्रमण काल की कवितायें ' !  इसकी कुछ कवितायें  पहले साझा कर चुका हूँ आप सबसे   आज इसी क्रम में 'अखराई' में साझा कर रहा अपनी इधर हाल की एक कविता  'मदर इंडिया' पढ़ कर आपके प्रतिसाद की प्रतीक्षा रहेगी
                                   ~ प्रेम रंजन अनिमेष

मदर इंडिया 2020
कई रातों में यही देखता
किसी दु:स्वप्न सा
उठ जाता आकुल सहसा                    


क्या आपको वह दृश्य परेशान नहीं करता
जिसमें प्लेटफॉर्म पर पड़ी एक माँ
और पास बच्चा नन्हा आँचल खींचता
जगाने की कोशिश करता 


यह किस पड़ाव पर
आ पहुँची मनुष्यता
किस ठाँव खड़ी 
महान यह सभ्यता 


क्या कोई मुकाम इसे
कह सकते ? 


यह कौन माँ
जिसकी ऐसी अवस्था
और इतनी अवशता 
कि फट गया हट गया
आँचल अपने छौनों के सिर से जिसका ? 


सबसे बेचैन करने वाली बात
कि इस दृश्य में कोई भी 
बढ़ता उनकी ओर नहीं दिखता
आँखों में लिये किंचित सहानुभूति या संभावना 


यह समाज है कैसा
जहाँ इतनी गहरी उपेक्षा
जिसमें मोल मायने नहीं रखता
इस तरह चले किसी का जाना
अंतिम उत्सर्ग भी वृथा सर्वथा
किसी महामारी से बड़ी यह विभीषिका 


बहानों से खाली हो चुके शासन को
मैं सुझाता एक बहाना
कहे वह कि लोग वहॉं थे निकट ही
और सरकार भी
पर चितेरे ने अपनी सहूलियत के लिए
चित्र लेते हुए
सबको कर दिया था किनारे 


हुकूमत का यह भी दावा
कि किसी अव्यवस्था के कारण नहीं हुआ ऐसा
बल्कि होता ही रहता
कोई हो और चाहे कैसी भी व्यवस्था 


दोमुँहे तंत्र का
मुँह दूसरा कहता
कि यह सच्चा 
चित्र ही नहीं यहाँ 
और इस समय का 


यह नहीं असली मदर इंडिया  


वह तो चमकती सितारों सी
संविधान के पन्नों में सुरक्षित
पोंछ रही उससे अपना
भूला बिसरा पहला नाम पुराना 


ताकि देश भर में एक स्वर से
सब गायें 
आई लव माई इंडिया
वतन मेरा इंडिया...
 
सबसे बड़ी आपदा असंवेदना
अगर ऐसे ही बढ़ती रही विभीषिका
और चलती रहीं हुकूमतें 
रही यही दिशा देश विश्व की
तो कहीं हो न ऐसा
एक दिन पृथ्वी रहे पड़ी
निर्जीव पार्थिव उस माँ सी 


विह्वल आँचल जिसका
हो खींच रहा
आगत
किसी नवागत नन्हे छौने सा
खाली लोगों से भरी
भरी भीड़ सी खाली
इस दुनिया में असहाय अकेला...

                                                    
                                      ~ प्रेम रंजन अनिमेष

बुधवार, 26 जून 2019

सवाल





'अखराई'  में  पिछली बार अपनी कविता
'क्यों साझा की थी अपने आने वाले कविता संग्रह
 'प्रश्नकाल शून्यकाल'  से 
जिसकी अनेक कवितायें
'दस्तावेज़' के नये अंक (161) में आई हैं और बहुत ही सराही गई हैं
कई लोगों ने आग्रह किया है  इसकी और कवितायें साझा करने के लिए
तो प्रस्तुत है  
'प्रश्नकाल शून्यकाल'   शृंखला की  
एक और कविता 'सवाल' 


                                               प्रेम रंजन अनिमेष 

सवाल 


µ                                         



दुनिया की अनगिनत मुश्किलें 
ढूंढ़ रहीं कबसे अपना हल 


और नहीं पातीं 
तो करतीं एक सवाल



बुरे हुए जो 
खैर उन्होंने 
अपनों का अपने जैसों का 
भरसक भला किया 



अच्छा कहलाने वालों ने 
अच्छाई का सच्चाई का 
भोले भाले भले भलों का 
सच में कहो किया क्या... ?

                                     ~ प्रेम रंजन अनिमेष 




सोमवार, 20 मई 2019

प्रश्नकाल शून्यकाल




'अखराई'  में  इस बार साझा कर  रहा  अपने आने वाले कविता संग्रह 'प्रश्नकाल शून्यकाल' से अपनी यह कविता  'क्यों'प्रश्नकाल शून्यकाल' में मन को मथती सवाल करती कवितायें हैं । इनमें से अनेक कवितायें हाल ही में दस्तावेज़ (अंक 161) में आई हैं और बहुत ही सराही गई हैं । तो साझा कर रहा उसी की एक बानगी

                              प्रेम रंजन अनिमेष 

क्यों


µ                                         

एक बात
समझ में नहीं आई


आँखों से भरे आसमान में
सतरंग सी छाई


धरती पर 
यहाँ से वहाँ तक
छाई की तरह बिछी
अच्छाई


फिर भी उस पर
हावी क्यों है
राई 
जितनी बुराई?


कह तू ही कुछ भाई


चुप है तू क्यों माई...?
                                                        ~ प्रेम रंजन अनिमेष 

गुरुवार, 29 जून 2017

मातृस्मृति...





    पिछली बार अपनी अमराईशृंखला की कुछ कवितायें साझा की थीं । उन्हें पढ़कर कई आग्रह आए शृंखला से कुछ और कवितायें साझा करने के लिए । अनुरोध सिर आँखों पर । शायद आगे कभी…!

    अभी तो बरसात की रुत है । झड़ियाँ लगी हुई हैं ! एक बरस ग्यारह महीने हो गए आज माँ को बिछड़े । अपनी इन दो कविताओं के फूल रख रहा उसकी स्मृति में नतशीश

                                 ~ प्रेम रंजन अनिमेष   

छोटा बच्चा
 


दिन महीने बरस हुए
माँ तुमसे बिछड़े...


पर लगता यही
मैं हूँ वही
वहीं का वहीं


जैसे मेले में भूला बच्चा
तुम मुझसे छूटी नहीं मैं ही छूट गया
भीड़ में हाथ पकड़ न सका ठीक से
या कहीं कोई खिलौना देखते
छिटक गया रेले में


समय आगे बढ़ता गया
दुनिया चली गयी कहाँ से कहाँ 
पर मैं वही
वहीं का वहीं


मेले में भूला
माँ तुम्हारा
छोटा बच्चा
छूटा बच्चा...



बड़ा बच्चा
 


आँसू छुपाता हूँ अपने
याद से जब कभी आ जाते
बाहर रहा तो दुनिया से
अपनों से घर में


इतना बड़ा बच्चा
रो कैसे सकता
किसी के आगे 


धो लेता पोंछ लेता जल्दी से
छुप कर चुपचाप कहीं
हालाँकि मुश्किल छुपना
इतने बड़े बच्चे का
फिर भी बचता फिरता


और तो और
छुपाने की कोशिश करता
माँ से भी
वह देख रही होगी
देख कर हो जाएगी दुखी
होगी जहाँ कहीं


है जहाँ कहीं
वहीं से बढ़ाती 
आँचल वह अपना
पोंछती छोह से


कहती हो जाओ चाहे कितने बड़े
इतने बड़े तो कभी हो नहीं सकते बच्चे  
कि छुपा लें
हाल अपना
अपनी माँ से...


                             ~ प्रेम रंजन अनिमेष