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बुधवार, 29 जनवरी 2020

वाग्देवी वंदना




वसंतपंचमी  की शुभकामनाओं  के साथ 'अखराई'  में  इस बार प्रस्तुत कर रहा  अपनी  यह  वाग्देवी  वंदना

               ~  प्रेम रंजन अनिमेष
           विद्यादायिनी वर दे...
 
          µ

पुस्‍तक हर इक कर में  धर माता
सबमें प्राण प्रतिष्‍ठ‍ित कर माता
 

शब्‍दों में है  जितनी सच्‍चाई
लोगों में है  जितनी अच्‍छाई

उसको पूर्ण प्रकाशित कर माता


 प्राणवान हर स्‍वर हर व्‍यंजन हो
जीवन में  धड़कन हो  जीवन हो
 

अक्षर हों सचमुच अक्षर  माता
 

हाथ लेखनी लिये  रचे  फिर से
मन की पाती हृदय रचे फिर से
 

हर अंतर  भावों से भर  माता
 

देखें  सच  सपने  दोनों  आँखें
दर्पण में गत आगत सँग झाँकें
 

सत शिव को कर सुंदरतर माता
 

असत आज है क्‍यों इतना आगे
भला अकेला  रातें  क्‍यों  जागे
 

पुण्‍यों को कर प्रखर मुखर माता
 

यह जग पहले से  इतना अनुपम
ज्ञान हमें दें मिल कर इसको हम
 

और  बना  दें   श्रेयस्‍कर  माता
 

आयें   चाहे   कि‍तनी   बाधायें
अपने  पथ पर  बढ़ते ही जायें
 

दे अनिमेष यही शुभ वर माता
 

प्रेम रंजन अनिमेष



मंगलवार, 31 जनवरी 2017

वाग्देवी वंदना यह एक मेरी भी...





सरस्वती पूजनोत्सव की शुभकामनायें अक्षरों लेखनी और रोशनाई से जुड़े आप सबको ! जब महाविद्यालय में था उस समय महाकवि महाप्राण निराला रचित वर दे वीणावादिनी’  को अपनी धुन में पिरोया और गाया था । परंतु कोई सरस्वती वंदना स्वयं रचने का सुयोग नहीं जुट पाया था । इस वर्ष गाते गुनगुनाते एक मातृ स्तुति अपने आप बन गयी । अबकी अपनी यही रचना आपसे साझा कर रहा हूँ । तो स्वीकार करें वाग्देवी वंदना यह एक मेरी भी...

                                                           ~ प्रेम रंजन अनिमेष 

नमन हे माँ... 
  
नमन तुझको  ज्ञान दे माता
बोध  का  वरदान  दे   माता


सृजन की हो साधना अविरत
हो हृदय में  भावना  उन्नत

प्रगति का  नवगान दे माता



दूसरों का दुख  करें  अनुभव
भाव हम में यों भरें अभि‍नव

सुख स्वयं  प्रतिदान दे माता



पंथ कितना  क्यों न पथराया
पर  तुम्हारे  स्नेह की  छाया

राह  कर  आसान  दे  माता



झूठ   जितने   पंख  फैलाये
मन  न उसके  मान में आये

सत्य  का  संज्ञान  दे  माता



ज्योति तेरी  हर अमा  हर ले
और  अंतस में  प्रभा  भर दे

दमकता  दिनमान  दे  माता



हों अमित  शाश्वत सभी अक्षर
और अग जग सत्य शिव सुंदर

शुभ अशुभ का  भान दे माता



सच सहज  स्वीकार  कर पायें
सोच  को  साकार  कर  पायें

स्वप्न  का  संधान  दे  माता



स्नेहसिंचित हाथ  रख सिर पर
श्रेय  को  कर  और  श्रेयस्कर

पुण्य  का  प्रतिमान  दे  माता



और  क्या  माँगें  भला  तुझसे
ज्ञात है सब  क्या छुपा  तुझसे

 स्वयं  की  पहचान   दे  माता...

                                                                      ~   प्रेम रंजन अनिमेष