शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

अंतर्देशी


    कविता के साथ साथ कहानी भी लिख लेता हूँ। कवि होने का फायदा है कि कहानियों में भी यथास्थान काव्य कौशल काम आता है। सौभाग्यवश 'गूंगी माँ का गीत', 'माई रे...', 'दी', 'पंचमी', 'सात सहेलियाँ...', 'पानी पानी', 'हिन्दी टीचर' आदि मेरी कहानियों के साथ ही उनमें प्रयुक्त कविताओं गीतों को भी पाठकों ने सर आँखों पर लिया और बहुत सराहा । अभी 'कथादेश' के अक्तूबर अंक में नयी कहानी 'तोहरी सुरतिया देख के...' पढ़कर लगातार फोन आ रहे हैं । सुधी पाठकों व कथा मर्मज्ञों को यह कहानी तो भायी ही है, उसमें सम्मिलित मेरी कविता 'अंतर्देशी' और गीत भी कहीं उनके अंतरतम के तार छू सके इसके लिए आभार !
 

इस बार 'अखराई' के मंच पर अपनी यही कविता 'अंतर्देशी' रख रहा हूँ । स्वाभाविक रूप से, कहानी के संदर्भ के साथ संभवतः यह कविता अधिक संवाद करे और उसके साथ इसे पढ़ना अवश्य चाहेंगे आप । किन्तु पहले मूल रूप से यह एक स्वतंत्र कविता के रूप में ही लिखी गयी थी (और कविता संग्रह 'नींद में नाच' में संकलित है जो भारतीय ज्ञानपीठ के पास प्रकाशन प्रतीक्षा में है ) । इसलिए इस तरह भी इसे समझा और सराहा जा सकता है । अगली बार, जैसा कई लोगों का आग्रह है, इस कहानी के दोनों गीत होंगे आपके सामने ! एक बार पुनः धन्यवाद पढ़ने और इतना सराहने के लिए । इसी तरह स्नेह बनाए रखिएगा
                            ~ प्रेम रंजन अनिमेष 

अंतर्देशी




यही कहता है वह
हाँ यही...

कनकट घड़ा हो तुम तो
फूटोगी भी नहीं !


धोखा और मुझे ?
जान जाता मैं तो उम्र औरत की
खुली उसकी पीठ देख कर
फाँस लिया मढ़ दिया गले मेरे
पाल पोस कर रखा यह बीमारियों का घर

फटा चमरौंधा ले जाएगा जिसे नहीं कोई
दरका आईना तुम
गिर कर टूटोगी भी नहीं !


गये हों पड़ोसी कहीं तो डरती पास आने में
आँच के करीब जाते लगता डर
ऐसे घुटती घर में और बिसूरती दरवाजे से लग कर
रात शीत में कर देता जब बाहर

जानता हूँ जैसी तुम
बीच सड़क पर
कलेजा कूटोगी भी नहीं...!


छा जाता आँखों के आगे अँधेरा फिर जब छँटता
तेरा माँ और बूढ़े पिता का तैर जाता चेहरा
भाई बहनों की सोच कर रह जाती कभी
मुँह आने वाले बच्चों का देख कर


कहकहे लगाता पीकर
कहता भला ठीकरे को क्या डर
कितना भी मारूँ ठोकर

उम्र भर की कैदी हो
इन सलाखों से इतनी आसानी से
छूटोगी भी नहीं...


                     ~ प्रेम रंजन अनिमेष 






गुरुवार, 28 सितंबर 2017

नवरात्रि दशरूपा




नवरात्रि व विजयादशमी की शुभकामनाओं के साथ इस बार अखराईमें साझा कर रहा हूँ अपनी कविता नवरात्रि दशरूपा...’ 
                      ~    प्रेम रंजन अनिमेष

नवरात्रि दशरूपा

µ
                 
नवरात्रि के दिन एक स्त्री
जल्दी जल्दी किये जा रही
कई काम एक साथ
जैसे हों उसके दस हाथ


एक हाथ से घर के देवताओं के
चरणों से हटाती फूल
दूसरे से पति को पकड़ाती प्याला गर्म चाय का
बिसूरते छोटे को सँभालती तीसरे से
चौथे से खिलाती बड़े को
पाँचवे में लिये छुरी खट खट काटती सब्जी


छठा बढ़ा है आँच की ओर चलाने के लिए खदकती दाल
सातवाँ लगा रहा अगम कोनों में झाड़ू उसके बाद करना पोंछा
आठवें से उतारती अलगनी से कपड़े सूखे
नवें से गोत रही जिन्हें धोना अभी
दसवें हाथ से थोपती सिर पर आँवला...


निपटा रही भाग दौड़ कर
काम तमाम घर संसार के
मामूली वह स्त्री
इस तरह जैसे भीतर उसके
उतर आयी समायी हों कितनी शक्तियाँ दैवी


दस हाथ फैलाये दसों दिशाओं में
समेट रही सब कुछ जल्दी जल्दी
कि चाहती है देखने जाये
बाहर प्रतिबिंबों सी सजी
अपनी ही तरह की प्रतिमायें
इससे पहले
कि विसर्जित हो जायें...

सोमवार, 28 अगस्त 2017

डोर





अखराईपर इस बार साझा कर रहा अपने कविता संग्रह अँधेरे में अंताक्षरीसे एक कविता डोर  

                         - प्रेम रंजन अनिमेष


डोर

µ


कंधे पर रखा किसी का हाथ
अजानी भीड़ के बीच कोई पुकार
कभी न गये शहर से एक पोस्टकार्ड
कहीं अदेखे फूटता कोई अंकुर
ओस में मुसकुराता नन्‍हा फूल


अचीन्हे शिशु की किलक
रास्ता दिखाने को उठी उँगली
खुली खिड़की से आती आँख भर रोशनी
किसी रसोई से उमगती गंध सोंधी सी
अकेली पगडंडी पर आगे चलते जाने का निशान


यही
इनमें से कोई
या कभी
मिल कर सभी
केश पकड़ कर खींचते ले आये किनारे
उदासी अवसाद विषाद के गहरे अँधेरे सागर से


फिर
जीवन के सीवान में...


                  - प्रेम रंजन अनिमेष


                      


गुरुवार, 27 जुलाई 2017

दूसरी विदाई






दो बरस पहले माँ को विदा किया था । कल दूसरी बरसी है उसकी । एक कविता उसे नमन स्मरण करते हुए श्रद्धासुमन स्वरूप

                          ~ प्रेम रंजन अनिमेष  


दूसरी विदाई



पहली विदाई माँ की
हमने नहीं देखी
देख भी कैसे सकते
पर देखते
जब तब चमकती उसकी आँखों में


याद जब कभी वह करती
और बताती
कैसे आ गयी थी बारात उसकी
समय से पहले ही
और रही थी
ब्याह के कितने दिन बाद तक वहीं


किस तरह कहाँ कहाँ से
रोशनी के साधन जुटाये गये थे
उस जमाने में


और शास्त्रार्थहुआ था कैसे
तीन भाषाओं के
ज्ञानी उसके वकील ससुर से
मझले चाचा ने सवाल कर दिये थे
खेती से जुड़े


दूर तक पहुँची थी छनते पकवानों की खुशबू
और बनीं किसिम किसिम की जाने कितनी मिठाइयाँ    
बँटती जो रहीं गाँव में
कितने दिन बाद तक उसके जाने के


पहली वह विदाई उसकी
माता पिता पितरों ने की थी
दूसरी विदाई हमने दी दो बरस पहले
उसके अपने जायों ने 



क्या उसके बारे में भी
जहाँ कहीं वह होगी अभी
बात करती होगी ?


या बस भरी डबडब आँखों से
देखती निहारती तकती होगी शून्य की ओर


शून्य ही तो हमने उसे दिया
आग और धुएँ के सिवा
राख उसकी पानी में
प्रवाहित करने से पहले...


                      ~ प्रेम रंजन अनिमेष  

  






गुरुवार, 29 जून 2017

मातृस्मृति...





    पिछली बार अपनी अमराईशृंखला की कुछ कवितायें साझा की थीं । उन्हें पढ़कर कई आग्रह आए शृंखला से कुछ और कवितायें साझा करने के लिए । अनुरोध सिर आँखों पर । शायद आगे कभी…!

    अभी तो बरसात की रुत है । झड़ियाँ लगी हुई हैं ! एक बरस ग्यारह महीने हो गए आज माँ को बिछड़े । अपनी इन दो कविताओं के फूल रख रहा उसकी स्मृति में नतशीश

                                 ~ प्रेम रंजन अनिमेष   

छोटा बच्चा
 


दिन महीने बरस हुए
माँ तुमसे बिछड़े...


पर लगता यही
मैं हूँ वही
वहीं का वहीं


जैसे मेले में भूला बच्चा
तुम मुझसे छूटी नहीं मैं ही छूट गया
भीड़ में हाथ पकड़ न सका ठीक से
या कहीं कोई खिलौना देखते
छिटक गया रेले में


समय आगे बढ़ता गया
दुनिया चली गयी कहाँ से कहाँ 
पर मैं वही
वहीं का वहीं


मेले में भूला
माँ तुम्हारा
छोटा बच्चा
छूटा बच्चा...



बड़ा बच्चा
 


आँसू छुपाता हूँ अपने
याद से जब कभी आ जाते
बाहर रहा तो दुनिया से
अपनों से घर में


इतना बड़ा बच्चा
रो कैसे सकता
किसी के आगे 


धो लेता पोंछ लेता जल्दी से
छुप कर चुपचाप कहीं
हालाँकि मुश्किल छुपना
इतने बड़े बच्चे का
फिर भी बचता फिरता


और तो और
छुपाने की कोशिश करता
माँ से भी
वह देख रही होगी
देख कर हो जाएगी दुखी
होगी जहाँ कहीं


है जहाँ कहीं
वहीं से बढ़ाती 
आँचल वह अपना
पोंछती छोह से


कहती हो जाओ चाहे कितने बड़े
इतने बड़े तो कभी हो नहीं सकते बच्चे  
कि छुपा लें
हाल अपना
अपनी माँ से...


                             ~ प्रेम रंजन अनिमेष


बुधवार, 31 मई 2017

अमराई की ओर...




आमों के इस मौसम में चलते हैं अमराई की ओर ! कुछ बरस पहले परिचयपत्रिका में अमराईकविता शृंखला की मेरी 32 कवितायें आयीं तो हर ओर से काफी सराहना मिली । मुझे याद है कवितायें पढ़ने के पश्चात प्रख्यात समालोचक डॉक्टर मैनेजर पांडेय जी ने अभि‍भूत होकर कहा था कि ये दुर्लभ कवितायें हैं और प्रक़ृति व संस्कृति से गहन जुड़ाव ही ऐसा उत्कृष्ट सृजन संभव कर सकता है ! यह वृहद शृंखला अपने आप में एक पूरी पुस्तक की तरह है जिसमें लगभग सौ कवितायें हैं । शायद कभी इस रूप में सामने आये । अभी अपनी इस शृंखला से कुछ कवितायें आपके सामने रख रहा हूँ । आपमें से कुछ ने शायद पहले भी पढ़ा होगा इन्हें । पर जब अमराई से गंध और कूज उठ रही है फिर से इनकी याद ताजा कर लेते हैं...    
                             
                                      -  प्रेम रंजन अनिमेष

अमराई


चिरनव
                               
पास से गुजरते अकसर
कभी दूर से बाँहें फैला कर
रोक लेता आम का वह पेड़ पुराना

हर बार
मिलता हूँ मैं उसे
जैसे पहली बार...


घाम
                             
कबके तपे हुए हैं ये

पहली बारिश के बाद ही
भरेगा इनमें रस
बूँदों से तिरेगी मिठास

उस पर भी
सुबह भिगो कर रखना
तो हक लगाना शाम

नहीं तो लग जायेगा भीतर का घाम...


फल
                               
इतने ऊँचे कद वाले वृक्ष
और फल
इतने जरा से इतने विरल

और ये छोटे गाछ भूमि से लगे
फल जिनके हाथों को चूमते
लदराये गदराये झमाट...


दाय
                                
मिट्टी ने उगाया
हवा ने झुलाया
धूप ने पकाया
बौछारों ने भरा रस

नहीं सब नहीं तुम्हारा
सब मत तोड़ो

छोड़ दो कुछ फल पेड़ पर
पंछियों के लिए
पंथियों के लिए...


भाग
                              
बौर तो आये लदरा कर
पर आधे टूट गये आँधियों में

तब भी टिकोले
काफी निकले

रोकते बचाते निशाने चढ़ गये कई
ढेलों गुलेलों के

जो बचे कुछ बढ़े
पकने से पहले
मोल कर गये व्यापारी

मैं इस पेड़ का जोगवार

मेरे लिए बस
गिलहरियों का जुठाया
चिड़ियों का गिराया
उपहार...


इतना सा
                                
कोर तक भरे कलश में तुम्हारे
आम का पल्लव
पहला प्यार

इतना सा अमृत जो लेता
और उसी को फैला देता
चारों ओर

भरा का भरा
रहता कलश तुम्हारा...


ठिठोली  
                             
छुप छुपा कर स्वाद लगाया
पर मुँह चिढ़ाता
अपरस यह उभर आया

मुँहजोर सखियों को ठिठोली का
अच्छा मिल गया बहाना

जैसे जागे हुए को उठाना
कितना कठिन समझाना
जानता है जो उसे

अब कहती हो
तो लेता मान
यह आम का ही निशान !

रह रह कर रस ले
वह निठुर भी...


बेहद
                               
एक तो माटी की
छोटी कोठरी
दूसरे जेठ की
पकाती गरमी
तिस पर नयी नयी शादी

और उसके साथ
खाट के नीचे
किसने रखा डाल
आमों का यह पाल...


गति
                             
सही सलामत
चपल तत्पर अपने पाँव

फिर भी
हम कहीं नहीं
वहीं के वहीं
वही धूप वही छाँव

और यह जो
कहलाने को लँगड़ा
दुनिया भर में
पूछा जाता कहाँ कहाँ...


प्रथम स्मरण 
                               
बहुत भरा
चढ़ कर उतरा
रस जीवन में

पर नहीं भूले
दाँत कोठ करने वाले
कुछ नन्हे टिकोले...


आगार
                             
फल तो फल अलग रंग रेशों के

फिर वो चटनी गुरमा कूचे अचार
अमावट अमझोर आमपाना अमचूर...

प्यार के सिवा
और कहाँ

आस्वाद का ऐसा विपुल आगार...