बुधवार, 22 जुलाई 2015

कविता और शहतूत

कविता और शहतूत’ – इस बार आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ अपनी यह कविता जो बहुत साल पहले आउटलुक ( हिन्दी ) में प्रकाशि‍त हुई थी । शहतूत की तरह यह कविता भी कई लोगों को विशेष प्रिय है और मुझे भी । शायद आपको भी अच्छी लगे 
                                          ~ प्रेम रंजन अनिमेष

कविता और शहतूत
                                          
मोतीहारी से मुजफ्फरपुर के सफर में
एक बच्चे के हाथ देख
फिर उसकी याद आयी
और याद आया
अब तक नहीं लिखी
शहतूत पर कविता

जिसे कबसे लिखना चाहता था
तब से जब
कविता का 'क' भी नहीं था पता

अब जबकि
उसका स्वाद भी
अजाना सा होने लगा है जुबान पर
लिख देना चाहता उसे
शहतूत का यह कर्ज है मुझ पर
जिसे बचपन की अलमस्ती में
बेमोल बेफिक्र खाया अघाया

याद की वह उँगली
चूसते फिर थामे
कितनी दूर निकल आया हूँ
कि भूलने लगा हूँ

उसे शहतूत के नाम से जानता मैं
आप किसी और नाम से जानते होंगे
पर विश्वास है कभी कभी स्वाद उसका
जरूर आपके भीतर भी उतरा होगा
उसी को संजोना चाहता हूँ
जितना हो सके अपनी कविता में

बचपन में बहुत चाहता था
बहुत सी चीजों को
और किसी कवि को पहचानता भी था
मगर क्या मालूम ऐसा क्यों लगता
कि तभी से था एक ऐसा इनसान बनना चाहता
जिसकी एक जेब में शहतूत हो
दूसरी में कविता

कविता और शहतूत में
किसकी उम्र लंबी है
नहीं जानता

यह खबर
आगे चल कर
कौन काम आयेगा किसके

बहरहाल शहतूत में है जिस तरह
कविता जैसा कुछ
इस कविता में रख देना चाहता
शहतूत का छोटा सा पता

कि कल को अगर
एक कोई खो जाये
तो दूसरे से
ढूँढ़ लिया जाये...

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविताएँ अच्छी तो लगती ही हैं। ऐसा लगता है जैसे कविता बिना किसी बोझ से दबे...वाद या विचार के.. चल रही है और पढ़नेवाले को भी हल्का/ ताज़ा कर देती है।

    आपकी किताबों का इंतज़ार है ।

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